18139राय
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देश में कृषि संकट और किसानों की समस्याएं काफी गंभीर होती  जा रही है और अब इन समस्याओं को अर्थशात्री, पत्रकार, और कृषि विशेषज्ञ अर्थव्यवस्था और मानव सभ्यता का संकट  मान रहे हैं। आज भारत के किसान खेती में अपना कोई भविष्य नहीं देखते। उनके लिए खेती-किसानी एक  बोझ बन गया है। हालात ये हैं कि देश का हर दूसरा किसान कर्जदार है। राष्ट्रीय नमूना  सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि यदि कुल कर्ज का औसत निकाला जाए तो देश के प्रत्येक  कृषक परिवार पर औसतम 47 हजार रुपए का कर्ज है। आंकड़े बताते हैं की अपनी आर्थिक स्थिति से तंग आकर  देश में पिछले दो दशकों में क़रीब साढ़े तीन  लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है। कृषि प्रधान देश की कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था के लिए इससे बड़ा संकट और क्या हो सकता है ? 1950 के दशक में भारत के  जीडीपी में कृषि क्षेत्र का हिस्सा50 प्रतिशत था। 1991 में जब नई आर्थिक नीतियां लागू  की गई थीं तो उस समय जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान क़रीब 35 प्रतिशत था, जो अब घटकर  करीब 13 प्रतिशत के आसपास रह गया  है जबकि देश की करीब आधी आबादी  अभी भी खेती पर ही निर्भर है। नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद से सेवा क्षेत्र में काफी फैलाव हुआ है जिसकी  वजह से आज भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की चुनिंदा अर्थव्यवस्थाओं में शुमार की जाने  लगी है, लेकिन सेवा क्षेत्र का यह बूम उस अनुपात में रोजगार का अवसर मुहैया कराने में  नाकाम रहा है। नतीजे के तौर पर आज भी भारत की करीब दो-तिहाई आबादी की निर्भरता  कृषि क्षेत्र पर बनी हुई है। भारत में हरित क्रांति के जनक कहे जाने वाले कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन का कहना है कि यह चिंताजनक स्थिति है और  एक बड़े कृषि संकट की आशंका की ओर इशारा कर रही है। Anchor: कुर्बान अली Guests : आशीष बहुगुणा (पूर्व कृषि सचिव) वी एम सिंह (किसान संगठनों की संघर्ष समिति के संचालक) #Agricultural #AgrarianCrisis #Farmers